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लाइसेंस प्राप्त शराब दुकानें जब शिक्षा के मंदिरों के पास हों — तो जिम्मेदार कौन?

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Bureau Report

भोपाल में शैक्षणिक संस्थानों के पास संचालित शराब की दुकान को लेकर उठे विवाद ने एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है कि यदि कोई दुकान लाइसेंस प्राप्त है, तो क्या वह स्वतः ही सामाजिक रूप से उचित भी हो जाती है। हाल ही में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा इस विषय पर किया गया विरोध यह स्पष्ट करता है कि समस्या केवल “अवैधता” की नहीं, बल्कि “नीतिगत संवेदनहीनता” की है। यदि किसी गर्ल्स कॉलेज और पॉलिटेक्निक कॉलेज के समीप विधिवत लाइसेंस लेकर शराब बेची जा रही है, तो यह कानून की वैधता और समाज की आवश्यकता के बीच के टकराव को उजागर करता है। सवाल यह नहीं है कि दुकान कानूनी है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या सरकार ने लाइसेंस देते समय उस स्थान की सामाजिक और शैक्षणिक संवेदनशीलता का मूल्यांकन किया था या नहीं। शिक्षा संस्थान वह स्थान होते हैं जहां युवा अपने जीवन की दिशा तय करते हैं, ऐसे में उनके आसपास शराब की उपलब्धता न केवल उनके व्यवहार को प्रभावित करती है बल्कि एक गलत सामाजिक संकेत भी देती है कि नशा सामान्य और स्वीकार्य है। यह “नॉर्मलाइजेशन” धीरे-धीरे युवाओं को प्रयोग से आदत और आदत से निर्भरता की ओर ले जाता है, जिसका प्रभाव उनकी पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य की उत्पादकता पर पड़ता है। इससे भी अधिक गंभीर पहलू छात्राओं की सुरक्षा का है, क्योंकि गर्ल्स कॉलेज के आसपास शराब दुकान का होना सीधे तौर पर असामाजिक तत्वों की आवाजाही को बढ़ाता है, जिससे छेड़छाड़, डर और असुरक्षा का माहौल बनता है, और इसका परिणाम यह होता है कि अभिभावक बेटियों की शिक्षा को लेकर चिंतित हो जाते हैं। यह स्थिति “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियानों की भावना के विपरीत है, क्योंकि केवल नारे देने से नहीं, बल्कि सुरक्षित वातावरण देने से ही वास्तविक सशक्तिकरण संभव है। सरकार अक्सर यह तर्क देती है कि शराब से मिलने वाला राजस्व राज्य के विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन यह तर्क तब कमजोर पड़ जाता है जब उसी राजस्व की कीमत युवाओं के भविष्य और महिलाओं की सुरक्षा के रूप में चुकानी पड़े। यदि एक ओर सरकार शिक्षा को बढ़ावा देने की बात करती है और दूसरी ओर शिक्षा संस्थानों के पास शराब की दुकान को लाइसेंस देती है, तो यह नीति में विरोधाभास को दर्शाता है। दीर्घकालिक दृष्टि से यह स्थिति देश के मानव संसाधन को कमजोर करती है, क्योंकि नशे की ओर झुकाव रखने वाला युवा वर्ग न तो अपनी पूरी क्षमता से पढ़ पाता है और न ही समाज के लिए उत्पादक बन पाता है, जिससे आर्थिक विकास भी प्रभावित होता है। इसके अलावा, शराब से जुड़े स्वास्थ्य समस्याएं और अपराध भी बढ़ते हैं, जिससे सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, यानी जो राजस्व आज कमाया जा रहा है, वह कल कई गुना खर्च में बदल सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकार लाइसेंस देने की प्रक्रिया में केवल कानूनी औपचारिकताओं तक सीमित न रहे, बल्कि सामाजिक प्रभाव का भी गंभीर मूल्यांकन करे, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां स्कूल, कॉलेज या छात्रावास स्थित हैं। शिक्षा के मंदिरों के आसपास शराब की दुकान का होना यह संकेत देता है कि हमारी नीतियों में कहीं न कहीं संवेदनशीलता की कमी है, और यदि इसे समय रहते नहीं सुधारा गया, तो इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। अंततः सरकार को यह तय करना होगा कि वह केवल कानून के अक्षर तक सीमित रहना चाहती है या उसके पीछे की भावना को भी समझना चाहती है, क्योंकि राष्ट्र निर्माण केवल वैध निर्णयों से नहीं, बल्कि सही और दूरदर्शी निर्णयों से होता है, और यदि शिक्षा के वातावरण को सुरक्षित और प्रेरणादायक नहीं बनाया गया, तो विकसित भारत का सपना केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।

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