
पत्रकार मुकेश तिवारी
“भारत के युवा अपनी अदम्य आध्यात्मिक शक्ति से न केवल राष्ट्र का उत्थान करेंगे, बल्कि सम्पूर्ण विश्व में परिवर्तन की एक नई धारा प्रवाहित करेंगे।
सनातन की प्रचंड लहर बनकर वे पूरे जगत को अपने तेज, अपने संस्कार और अपने विचारों से आलोकित करेंगे।”
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, और “राष्ट्र” शब्द अपने आप में अखण्डता, एकता, संस्कृति और सभ्यता की महक समेटे हुए है। राष्ट्र का तात्पर्य मात्र सीमाओं से नहीं, बल्कि एक भावनात्मक और सांस्कृतिक इकाई से है। परंतु प्रश्न यह है—जिस भारत की कोई मातृभाषा निश्चित नहीं, जहाँ के विद्यालयों में रामचरितमानस और श्रीमद्भागवत पुराण जैसे ग्रंथों का अध्ययन अनिवार्य नहीं, जहाँ बच्चों को आध्यात्मिक शिक्षा का आधार नहीं दिया जा रहा—वह भारत विश्वगुरु कैसे बनेगा?
हम कहते हैं—“भारत भव्य होगा, सभ्य होगा, दिव्य होगा, यज्ञमय होगा।” परंतु यह कैसे संभव है, जब हम अपनी जड़ों से ही कटते जा रहे हैं? जिस राष्ट्र की संस्कृति की नींव शून्य से शिखर तक आध्यात्मिकता पर टिकी हो, यदि वही राष्ट्र शिक्षा में संस्कृति का बीज न बोए, तो भव्यता और विश्वगुरुता केवल एक नारा बनकर रह जाएगी।
*हम सबका एक ही नारा भारत विश्व गुरु हमारा*









