
रिपोर्टर – आशीष पाण्डेय
रतनपुर, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध करने वाला रतनपुर स्थित मां महामाया मंदिर श्रद्धा, इतिहास और प्राचीन स्थापत्य कला का अद्भुत संगम है। लगभग एक हजार वर्ष पुराना यह मंदिर प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान रखता है। मां महामाया को दक्षिण कोसल की अधिष्ठात्री देवी कोसलेश्वरी के रूप में भी पूजा जाता है। सदियों से यह धाम श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
इतिहास: देवी के दर्शन से जुड़ी है रतनपुर की स्थापना की कथा ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, मां महामाया मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में कलचुरी वंश के राजा रत्नदेव प्रथम ने करवाया था। प्रचलित कथा के अनुसार, राजा रत्नदेव प्रथम शिकार के लिए तुम्माण से मणिपुर नामक गांव पहुंचे थे। रात्रि विश्राम के दौरान उन्हें देवी के दिव्य दर्शन हुए और उन्होंने वहां देवी की आराधना का अलौकिक दृश्य देखा।
इस घटना से प्रभावित होकर राजा ने मणिपुर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया। आगे चलकर इस स्थान का नाम रतनपुर पड़ा। जिस स्थान पर राजा को देवी के दर्शन हुए थे, वहीं मां महामाया के भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया।
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, मंदिर का मूल स्वरूप महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की उपासना से जुड़ा था। बाद में विक्रम संवत 1552 यानी 1495 ईस्वी के आसपास राजा बाहर साय द्वारा मंदिर के पुनर्निर्माण का उल्लेख मिलता है। मराठा काल में मंदिर परिसर को विकसित कर इसे नया स्वरूप दिया गया। समय-समय पर हुए जीर्णोद्धार से इसकी ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत संरक्षित रही है।
धार्मिक महत्व: शक्तिपीठ परंपरा में विशेष स्थान मां महामाया मंदिर धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती का दायां स्कंध गिरा था, जिसके कारण इसे शक्तिपीठ परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। मां महामाया रतनपुर राजपरिवार की कुलदेवी के रूप में भी पूजित हैं।
मंदिर की वास्तुकला प्राचीन भारतीय स्थापत्य परंपरा का सुंदर उदाहरण है। उत्तरमुखी मंदिर नागर शैली में निर्मित है और इसका मंडप 16 पत्थर के स्तंभों पर आधारित है। गर्भगृह में महालक्ष्मी और महासरस्वती की प्रतिमाएं श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र हैं।
छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है रतनपुर रतनपुर को उसकी समृद्ध धार्मिक विरासत के कारण छोटी काशी भी कहा जाता है। यहां मां महामाया मंदिर के अलावा रत्नेश्वर महादेव, वृद्धेश्वर नाथ और गिरिजाबंध हनुमान सहित अनेक प्राचीन मंदिर स्थित हैं। मंदिरों और ऐतिहासिक तालाबों से समृद्ध यह नगर धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपराओं को भी दर्शाता है।
नवरात्रि में उमड़ती है श्रद्धालुओं की आस्था चैत्र और शारदीय नवरात्रि के अवसर पर मां महामाया मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और भव्य धार्मिक आयोजन होते हैं। इन अवसरों पर देश के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
इस वर्ष नवरात्रि के दौरान मंदिर प्रबंधन के अनुसार घी, तेल और मनोकामना ज्योति कलश की संख्या लगभग 30 हजार तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और धार्मिक परंपराओं के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।
धार्मिक पर्यटन के विकास की दिशा में पहल बिलासपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित मां महामाया धाम को पर्यटन की दृष्टि से और अधिक विकसित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू ने मंदिर को केंद्र सरकार की ‘प्रसाद’ योजना में शामिल करने और यहां विशेष कॉरिडोर विकसित करने की मांग उठाई है। इस पहल से धार्मिक पर्यटन को प्रोत्साहन मिलने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के नए अवसर विकसित होने की संभावनाएं हैं।
छत्तीसगढ़ की पहचान है मां महामाया धाम स्थानीय लोगों के अनुसार, मां महामाया मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक परंपरा और जनआस्था का प्रतीक है। लगभग एक हजार वर्षों की यात्रा के बाद भी यह धाम अपनी धार्मिक महत्ता और ऐतिहासिक पहचान के साथ श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहा है। मां महामाया के प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा रतनपुर को प्रदेश के प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में विशिष्ट स्थान दिलाती है।









