
लखनऊ की पहचान सिर्फ नवाबी तहज़ीब और शायरी तक सीमित नहीं है बल्कि उसकी असल आत्मा उसकी अद्वितीय कला चिकनकारी में भी छुपी है जो महीन कपड़े पर सुई-धागे से उकेरी गई इतनी नफ़ासत और खूबसूरती लिए होती है कि देखने वाला इसे किसी चित्रकारी से कम नहीं समझता फर्क बस इतना है कि यहाँ ब्रश नहीं बल्कि सुई का जादू चलता है और रंगों की जगह कच्चे सूत के धागे अपनी चमक बिखेरते हैं। ‘चिकन’ शब्द की जड़ें फ़ारसी भाषा में मिलती हैं जहाँ फारसी शब्द चाकिन का अर्थ है कशीदाकारी या बेल-बूटों को उभारना। मुगल काल में यह कला भारत आई और लखनऊ की मिट्टी में पनपकर अमर हो गई। जिस तरह ताजमहल और लालकिला मुग़लिया शान के प्रतीक हैं उसी तरह चिकनकारी को भी एक अनमोल सांस्कृतिक विरासत माना जाता है। कहा जाता है कि मुगल सम्राट जहांगीर की पत्नी नूरजहां इस कला को ईरान से लेकर आई थीं और उनकी बांदी बिस्मिल्लाह ने इसे दिल्ली से लखनऊ लाकर प्रसारित किया। नूरजहां ने महलों और इमामबाड़ों की दीवारों पर बनी नक्काशी को कपड़ों पर उतारने की कोशिश की और नवाबी दौर में चिकनकारी को और अधिक संरक्षण मिला जहाँ नवाब खुद चिकनकारी वाले अंगरखे और टोपियां पहनते थे जिससे इसकी शान और बढ़ गई।
चिकनकारी सिर्फ धागों का खेल नहीं बल्कि यह कलाकार की आंखों की रोशनी और कलात्मक संवेदना की भी परीक्षा है क्योंकि महीन टांकों और जालियों से बुना यह संसार जटिल होते हुए भी बेहद मोहक है। इसमें लगभग 40 प्रकार के टांके और जालियां प्रयुक्त होते हैं जिनके नाम भी रोचक हैं जैसे मुर्री, फनदा, कांटा, तेपची, पंखड़ी, लौंग जंजीरा, राहत, बंगला जाली, मुंदराजी जाली, सिद्दौर जाली, बुलबुल चश्म जाली और बखिया जिनमें सबसे कठिन और कीमती है नुकीली मुर्री जो कच्चे सूत के तीन या पाँच तारों से बेहद बारीकी से बुनी जाती है। किसी भी कपड़े पर चिकनकारी करने से पहले उस पर बूटा लिखा जाता है जिसमें लकड़ी की छाप पर बेल-बूटों के डिज़ाइन खोदकर उन्हें कच्चे रंग से कपड़े पर छापा जाता है और यही डिज़ाइन कलाकारों की सुई का मार्गदर्शन करते हैं। कढ़ाई पूरी होने के बाद कपड़े को विशेष धोबियों से धुलवाया जाता है जो न केवल कच्चे रंग को हटाते हैं बल्कि सूत की कली को निखारकर उसे और अधिक उजला और आकर्षक बना देते हैं। आज भी लखनऊ की गलियों में चलते हुए यदि आप चिकनकारी के कपड़े देखें तो महसूस करेंगे कि यह केवल कपड़ा नहीं बल्कि सदियों की मेहनत धैर्य और कलात्मकता का जीवंत प्रमाण है क्योंकि यह कला महज एक शिल्प नहीं बल्कि लखनऊ की आत्मा है उसकी तहज़ीब है उसकी नफासत है और उसकी पहचान है। चिकनकारी सिर्फ सुई-धागे का काम नहीं है बल्कि यह धागों से बुनी कविता है कपड़े पर उकेरी गई मुग़लिया तहज़ीब है और लखनऊ की धड़कन है।
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रिद्धि मेहरोत्रा लखनऊ









