
रिपोर्टर लखन ठाकुर
ग्राम चोली। शाम ढलते ही गांव की गलियों में संझा माता के पारंपरिक गीतों की मधुर गूंज सुनाई देने लगती है। घरों की दीवारों पर गोबर और मिट्टी से बनाई गई संझा माता की आकर्षक आकृतियां लोककला की सुंदर छटा बिखेर रही हैं। यह सोलह दिवसीय लोकपर्व मालवा की लोकसंस्कृति, कला और पारिवारिक संस्कारों से गहराई से जुड़ा हुआ है। संझा पर्व के दौरान बालिकाएं और महिलाएं प्रतिदिन शाम को दीवारों पर संझा माता की अलग-अलग आकृतियां सजाती हैं। फूल, पत्तियां, रंगीन कागज, गोबर और प्राकृतिक सामग्री से तैयार इन आकृतियों में पारंपरिक लोककला की सुंदर अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। इसके बाद विधिवत पूजा-अर्चना कर सामूहिक रूप से पारंपरिक गीतों का गायन किया जाता है। सुख-समृद्धि और पारिवारिक मंगल की कामना लोकमान्यता के अनुसार संझा माता का पर्व सुख-समृद्धि, पारिवारिक मंगल और सुखद दांपत्य जीवन की कामना से जुड़ा है। कुंवारी कन्याएं अच्छे वर और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से संझा माता की आराधना करती हैं, जबकि परिवार की महिलाएं घर-परिवार की खुशहाली एवं समृद्धि के लिए पूजा-अर्चना करती हैं।
सोलह दिनों तक चलने वाले इस पर्व में प्रतिदिन संझा की नई आकृति बनाई जाती है और उसके अनुरूप पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं। इन गीतों में लोकजीवन, पारिवारिक रिश्तों, प्रकृति और सामाजिक परंपराओं की सुंदर झलक देखने को मिलती है।
नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ रहा संझा पर्व
आधुनिक समय में संझा माता का पर्व लोकपरंपराओं और लोककलाओं को सहेजने का महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है। शाम के समय बालिकाओं और महिलाओं का एक साथ बैठकर संझा बनाना, गीत गाना और पूजा-अर्चना करना सामाजिक मेलजोल को बढ़ावा देने के साथ नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ रहा है। सोलह दिनों तक चलने वाला यह पर्व ग्राम चोली के वातावरण में विशेष सांस्कृतिक रंग भर रहा है। दीवारों पर साकार होती संझा माता की आकृतियां और गूंजते पारंपरिक गीत मालवा-निमाड़ की समृद्ध लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं।









