
रिपोर्ट:- बी एल चौधरी
बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक पावन पर्व विजयादशमी (दशहरा) पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। जगह-जगह रावण, कुंभकरण और मेघनाद के विशाल पुतलों के दहन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। लेकिन इस बार दशहरे के अवसर पर प्रबुद्ध नागरिकों और युवाओं के बीच एक नई सोच और संकल्प की लहर देखने को मिल रही है।
नागरिकों का मानना है कि केवल कपड़े और घास-फूस के पुतलों को जलाने से विजयादशमी का पर्व पूरा नहीं होता। वास्तविक अर्थों में दशहरा तब सार्थक होगा, जब हम नगर और अपने भीतर गहराई से जड़ जमा चुके अहंकार और भ्रष्टाचार रूपी रावण का अंत करेंगे।
स्थानीय प्रबुद्धजनों का कहना है कि आज के दौर में अहंकार रिश्तों और समाज को दीमक की तरह चाट रहा है, वहीं भ्रष्टाचार देश के विकास में सबसे बड़ी रुकावट बना हुआ है। असत्य और अन्याय के खिलाफ लड़ाई सिर्फ पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे हर व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में उतारना होगा।
जब तक नगर से भ्रष्टाचार और व्यक्ति के भीतर से अहंकार का दहन नहीं होगा, तब तक सही मायने में सत्य की जीत अधूरी है। आइए इस दशहरे पर ईमानदारी और सत्य के मार्ग पर चलने का दृढ संकल्प लें।
भ्रष्टाचार मुक्त नगर और एक पारदर्शी और न्यायप्रिय व्यवस्था का निर्माण करना। दशहरे पर केवल पुतला दहन नहीं, इस विजयादशमी नगर से भ्रष्टाचार और मन से अहंकार का भी दहन होना चाहिए। आइए सत्य और ईमानदारी के मार्ग पर चलने का संकल्प लें!विजयी भव!









