
रिपोर्टर – डालचंद लोधी
शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना कर महिलाओं ने सुनी व्रत कथा, सात संख्या का रहा विशेष महत्व रायसेन। हिंदू धर्म में संतान सप्तमी व्रत का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को महिलाएं अपनी संतान की सुख-समृद्धि, दीर्घायु एवं मंगलकामना के लिए व्रत रखती हैं। इस अवसर पर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।रायसेन जिले के विकासखंड उदयपुरा अंतर्गत ग्राम नयाखेड़ा में महिलाओं ने सुबह नर्मदा स्नान कर पूजा-अर्चना की तैयारियां कीं। इसके बाद पंडित गोविंद शुक्ला के मार्गदर्शन में व्रत कथा का श्रवण किया गया। कथा के पश्चात महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर संतान के सुखी एवं मंगलमय जीवन की कामना की। पूजा में सात संख्या का विशेष महत्व संतान सप्तमी के धार्मिक अनुष्ठान में सात संख्या का विशेष महत्व बताया गया है। व्रत के दौरान रक्षा सूत्र के रूप में कलावा या रेशमी धागे में सात गांठ लगाकर उसे हल्दी और केसर से रंगा जाता है। पूजा के बाद इस रक्षा सूत्र को भगवान शिव एवं माता पार्वती को अर्पित कर महिलाएं अपनी दाहिनी कलाई अथवा गले में धारण करती हैं। व्रत की परंपरा के अनुसार शुद्ध घी और आटे से सात मीठे पूए तैयार किए जाते हैं। पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है। पूजन के पश्चात सात परिक्रमा करने की परंपरा भी निभाई जाती है। संतान सप्तमी के अवसर पर महिलाओं ने श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि एवं संतान के उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना की।









